Lippa village

PRESS NOTE : NGT directs Kashang Project Forest Diversion Proposal to be placed before Gram Sabhas of affected villages; asks for compliance to provisions of Forest Rights Act 2006

5 May 2016

The National Green Tribunal, yesterday, on 4th May 2016, passed a judgement directing the Ministry of Environment and Forests and the State Government of Himachal to place the entire forest clearance proposal  for the Integrated Kashang (stage II and III) Hydroelectric Project before the affected Gram Sabhas for their perusal. The judgement was passed by the Principal Bench chaired by Justice Swatanter Kumar in the appeal challenging the Forest Clearance for the project proposed in Kinnaur. The appeal against the forest diversion was made by Paryavaran Sanrankshan Sangarsh Samiti Lippa village. The appeal challenged the forest diversion on the grounds that it had violated the provisions of the Forest Rights Act 2006 which require a mandatory No-objection-certificate of the Gram Sabha of villages to be affected by the diversion of forest lands for the project. The judgement has concluded that, “the Gram Sabha shall consider all community and individual claims” in the process bringing under it the cultural, religious, environmental and livelihood impacts as a result of the loss of forests and water sources.
Said Shri S.S Negi, a resident of the Lippa Village, “We welcome this judgement because it upholds the right of the people under the Forest Rights Act 2006”. The project is proposed on the Kashang and Kerang streams- the right bank tributaries of Satluj River in Morang Tehsil of District Kinnaur. “Our other main contention is that the water of Kerang stream washes off the debris brought by Pager(a tributary of Kerang stream) and once water of Kerang stream is diverted, Lippa village would be buried under the debris brought by Pager,” adds Negi. The origin of Integrated Kashang Project goes back to 2002 when a 65 MW hydroelectricity project was conceptualised under Himachal Pradesh State Electricity Board (HPSEB). However, later 3 more projects were integrated with the initial design (65 MW Kashang) to develop a 1800 crore project to be executed by the state owned Himachal Pradesh Power Corporation Ltd (HPPCL). Out of these Stage-1 is under construction; for stage II and III the project proponent got the Environment clearance and the Forest Clearance but construction work could not started due to strong local opposition.

Local resistance to hydroprojects in Kinnaur has gained a lot momentum in the last few years due to a wide range of issues. Interestingly, the judgement expresses grave concern over “the folly of allowing hydel projects in the State at such alarming scale which was highlighted earlier manifestly resulting in serious consequences to its ecology and environment and, the very life and livelihood of the people in whose benefit the State claims to have allowed the projects”. The NGT judgement also refers to the adverse impacts of these projects on the environment highlighted by the One Man Committee (Avay Shukla Committee formed by Shimla High Court in 2011). The judgement puts on record the that 167 water sources have been adversely affected in the project areas of Karcham Wangtoo HEP. “These illustrate the adverse effect on only one aspect of the environment within just one project area. We can,therefore, well imagine the cumulative impact of the 150 projects” states the order. The NGT judgement also slams the MoEF for being evasive with regard to the cumulative impact assessment report of the Satluj river basin.

Prakash Bhandari of Himdhara, an environment group that has been raising environmental issues with Hydro electric projects adds, “There are close to 150 natural water springs in the Lippa area on which people depend for irrigation. Further Morang Tehsil, where the project is proposed is the abode of Chilgoza pine- a rare endangered tree species. The forest area of 63 hectares which is going to be diverted for the project has Chilgoza pine as the dominant species”

Advocate Ritwick Dutta, representing the Samiti in the case said, “In 2009 the Ministry of Environment made it mandatory that the gram sabha consent be sought by project proponents as part of the Forest Clearance process. Infact, the forest clearance was granted to the Kashang project with the condition that FRA compliance has to be ensured”.

In the case of Himachal, where 69% of the total geographical area is under forest, this judgement is extremely important. It has been close to 8 years and the government is dragging its feet on the implementation of the Forest Rights Act 2006 which recognizes the inalienable rights of the communities over their forest areas and makes Gram Sabha NOCs for forest diversion mandatory. According to the Forest Department’s own data, from 1981 to 2015, more than 12,000 hectares of forest land on which people had user rights, have been diverted for various projects and close to 60% of this is for hydropower projects and transmission lines. “Its ironic that the state government has been diverting forest lands even in Schedule V areas without implementing the FRA. We hope that this judgement will put pressure on the State government to act.”, added R.S Negi of Him Lok Jagriti Manch.

प्रेस विज्ञप्ति: 5 मई 2016

एन.जी.टी. का आदेश – काशांग परियोजना के लिए वन भूमि हस्तांतरण के प्रस्ताव को प्रभावित गांवों की ग्राम सभाओं के समक्ष रखा जाए; कहा कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रावधानों की अनुपालना की जाए।

राष्ट्रीय हरित ट्राइब्यूनल ने आज जारी किए एक आदेश में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय तथा हिमाचल प्रदेश सरकार से कहा है कि वे वन हस्तांतरण का पूरा प्रस्ताव प्रभावित ग्राम सभाओं के समक्ष रख कर उनसे अनुमति लें। यह आदेश जस्टिस स्वतंत्र कुमार की प्रमुख बेंच द्वारा एकीकृत काशांग (स्अेज 1 और 2) जल विद्युत परियोजना के लिए किए जाने वाले वन हस्तांतरण को चुनौती देने वाली एक अपील के संदर्भ में दिया। वन हस्तांतरण के विरुद्ध यह अपील किन्नौर के लिप्पा गांव की पर्यावरण संरक्षण संघर्ष समिति ने की थी।

इस अपील में वन हस्तांतरण को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि इसमें वनाधिकार अधिनियम 2006 के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है, जिसके अंतर्गत प्रभावित ग्राम सभाओं से हस्तांतरण के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य है। आदेश के अंत में कहा गया है कि, ‘‘ग्राम सभा सभी व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों पर विचार करेगी’’ जिसके अंतर्गत वनों और पानी के स्रोतों के चले जाने से होने वाले सांस्कृतिक, धार्मिक, पर्यावरणीय और आजीविका प्रभावों का आकलन किया जाए।

लिप्पा गांवा के श्री.एस.एस.नेगी का कहना है, ‘‘हम इस आदेश का स्वागत करते हैं क्योंकि इसमें गांव के लोगों के स्वीकृति देने के अधिकार को मान्यता दी गई है, खासकर वनाधिकार अधिनियम के संदर्भ में’’। यह परियोजना काशांग और केरांग – दो नदियों पर प्रस्तावित है। यह दोनों नदियां सतलुज नदी के दाहिने किनारे की उपनदियां हैं, जो किन्नौर जि़ले की मोरांग तहसील में पड़ती हैं।

‘‘हमाने जो दूसरा प्रमुख सवाल उठाया है, वह यह है कि केरांग नदी का पानी पेजर (केरांग नदी की उपनदी) मंे आने वाले मलबे को साफ़ करता है और अगर केरांग के पानी की दिशा का बदल दिया जाएगा, तो लिप्पा गांव पेजर में आने वाले मलबे में धंस जाएगा,’’ नेगीजी ने बताया।

एकीकृत काशांग परियोजना वर्ष 2002 से प्रस्तावित है, जब इसे हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड के अंतर्गत 65 मे.वा. बिजली उत्पादन परियोजना के रूप में रखा गया था। लेकिन, इस शुरुआती उिज़ाइन में बाद में 3 और परियोजनाओं को शामिल कर दिया गया, जिसे हिमाचल प्रदेश पाॅवर कारपोरेशन लिमिटेड कुल 1800 करोड़ की लागत से बनाएगा।इनमें से स्टेज-1 का निर्माण शुरू हो चुका है; और स्टेज 2 व 3 के लिए पर्यावरण एवं वन हस्तांतरण की स्वीकृति मिल चुकी है, हांलाकि स्थानीय विरोध के चलते इनका निर्माण शुरू नहीं हो सका। स्थानीय लोगों ने दोनों स्वीकृतियों के खिलाफ़ राष्ट्रीय हरित ट्राइब्यूनल में अपील की है।

किन्नौर में पिछले कुछ वर्षों में कई मुद्दों को उठाते हुए, जल विद्युत परियोजनाओं के विरुद्ध स्थानीय विरोध काफी बढ़ा है।

आदेश में चिंता जताई गई है कि, ‘‘राज्य में इतने बड़े पैमाने पर जल विद्युत परियोजनाओं की अनुमति दी जा रही है, जिस पर पहले भी ज़ोर दिया गया था कि इसके कारण पारिस्थितिकी और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ रहे हैं और, उन लोगों के जीवन औभ् आजीविकाओं पर भी, जिन के नाम पर राज्य इन परियोजनाओं को अनुमति देने का दावा करता है’’।

हिमधरा पर्यावरण समूह के प्रकाश भंडारी का कहना है कि, ‘‘इस क्षेत्र में लगभग 150 प्राकृतिक पानी के स्रोत हैं, जिनपर लोग सिंचाई के लिए निर्भर हैं। इसके अलावा, मोरांग तहसील, जहां पर यह परियेजना बनाई जाएगी, बेहद दुर्लभ चिलगोज़े के पेड़ों के लिए जानी जाती है। इस परियोजना के लिए हस्तांतरित किए जाने वाली 63 हैक्टेयर वन भूमि में मुख्यतः चिलगोज़े के ही पेड़ हैं।
एडवोकेट रितविक दत्ता, जो समिति की ओर से इस मामले की पैरवी कर रहे हैं ने कहा, ‘‘वर्ष 2009 में पर्यावरण मंत्रालय ने वन भूमि हस्तांतरण के
लिए ग्राम सभा की अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया था। और वास्तव में, काशांग परियोजना को भी वन मंजूरी इसी शर्त पर दी गई थी कि उन्हें वनाधिकार अधिनियम के प्रावधानों की अनुपालना करनी होगी’’।

हिमाचल प्रदेश, जहां कुल क्षेत्रफल का 69 प्रतिशत वन क्षेत्र है, के संदर्भ में यह आदेश बेहद महत्वपूर्ण है। पिछले 8 सालों से राज्य सरकार वनाधिकार अधिनियम, 2006 को लागू करने में पिछड़ रही है, जिसके अंतर्गत स्थानीय लोगों के उनके वनों पर अधिकारों को मान्यता दी गई है और वन हस्तांतरण के लिए ग्राम सभा की स्वीकृति को अनिवार्य माना गया है। वन विभाग के अपने ही आंकड़ों के अनुसार, 1981 से 2015 के बीच 12,000 हैक्टेयर से ज़्यादा लोगों के उपयोग के अधिाकर वाली वन भूमि को विभिन्न परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित किया गया और इसमें से 60 प्रतिशत वन भूमि जल विद्युत परियोजनाओं और ट्रांसमिशन लाइनों के लिए हस्तांतरित की गई है। इन वनों, जो पहाड़ी पारिस्थितिकी और स्थानीय आर्थिकी में प्रमुख स्थान रखते हैं, की सुरक्षा तभी की जा सकती है जब परियोजनाओं के लिए विशाल स्तर पर होने वाले वनों के विनाश पर रोक लगाई जाए और लोगों के वनों के प्रबंधन और संरक्षण अधिकारों को
मान्यता दी जाए।
‘‘आश्चर्य की बात है कि राज्य सरकार शेड्यूल 5 क्षेत्रों में भी वनाधिकार अधिनियम लागू किए बिना ही वन भूमि का हस्तांतरण करती जारही है। हमें उम्मीद है कि इस आदेश से राज्य सरकार पर दबाव बनेगा कि वह वनाधिकार अधिनियम लागू करे’’, हिम लोक जागृति मंच के श्री. आर.एस. नेगी ने कहा।

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