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प्रेस नोट : 11 April 2019 | मंडी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का मुद्दा वन अधिकार कानून!

भारत के 17वे लोक सभा चुनाव के माहौल में, क्षेत्रफल के हिसाब से हिमाचल के सबसे बड़े संसदीय निर्वाचन क्षेत्र मंडी जिसमे लाहौल-स्पीती, किन्नौर, भरमौर और कुल्लू ज़िले शामिल हैं में वन अधिकार कानून का मुद्दा जोर पकड़ रहा है. मंडी शहर के सेरी मंच पर हिमाचल वन अधिकार मंच द्वारा आयोजित एक दिवसीय धरना प्रदर्शन और रैली में इस मुद्दे को लेकर लगभग 600 लोग आज 11 अप्रैल को एकत्रित हुए! वन अधिकार कानून 2006 के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता हिमाचल प्रदेश की अधिकांश आबादी के लिए बहुत ही आवश्यक है और इसके बावजूद हिमाचल प्रदेश सरकार और प्रशासन राज्य में इस कानून के क्रियान्वयन में असफल रहा है. इसी क्रम में अपनी मांगों को मुखर करने के लिए, हिमाचल वन अधिकार मंच, जो की सामुदायिक संगठनों और सामजिक कार्यकर्ताओं का एक मंच है, ने यह कार्यक्रम आयोजित किया. ध्यान देने की बात है की वन भूमि पर अपनी रोजमर्रा की जरूरतों व आजीविका के लिए निर्भर समुदायों के वन भूमि पर उनके हितों एंव हकों की रक्षा के साथ ही साथ उनको कानूनी मान्यता देने के लिए वन अधिकार कानून को भारत की संसद ने 2006 में पारित किया था. . पिछले 10 वर्षों में पुरे देश में लाखों लोगों को वन अधिकार कानून के तहत फायदा मिला है जबकि हिमाचल प्रदेश में अभी तक केवल 129 दावों को मान्यता मिली है. “हिमाचल प्रदेश के भीतर भी किन्नौर, लाहौलस्पीती और कांगड़ा में कम से कम दावे तो किए गए हैं, जबकि मंडी जिला का मामला बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, यहां 2014 से प्रशासन ने सभी गांवों की वन समितियों से ‘शून्य दावों’ के प्रमाण पत्र लिए हैं, जो दर्शाता है कि इस कानून के तहत लोगों का कोई दावा नहीं है”, हिमाचल वन अधिकार मंच के संयोजक अक्षय जसरोटिया ने बताया. यह कदम जिला उपायुक्त ने प्रिंसिपल सेक्रेटरी, वन द्वारा जून 2014 में जारी प्रपत्रों के आधार पर उठाया गया था. जसरोटिया ने बताया “हम इन प्रपत्रों को खारिज करने के लिए लगातार मांग उठा रहे हैं क्योंकि ये प्रपत्र वन अधिकार कानून का उल्लंघन करते हैं”.

श्याम सिंह चौहान, जो करसोग मंडी से जिला परिषद् सदस्य होने के इलावा इस कानून के तहत बनी जिला स्तरीय समिति का सदस्य हैं ने जनता को बताया कि उन्होंने जनवरी में इस कानून के तहत गठित राज्य स्तरीय निगरानी समिति को इन शुन्य दावों के प्रपत्रों पर ज्ञापन लिखा था एवं समिति ने 15 जनवरी की अपनी बैठक में यह कहा था की इस प्रपत्रों की वजह से कानून लागू करने में गड़बड़ हुई है और राजस्व तथा वन विभाग को कानून की धारा 3(1) के तहत अधिकारों को मान्यता देने पर तुर्रंत कार्यवाही के आदेश देने का निर्णय लिया था जिसपर पिछले 3 महीनों में कार्यवाही नहीं हुयी.

गौर तलब है की राज्य में लाखों परिवार खेती और रिहाइश के लिए दिसंबर 2005 से पहले से वन भूमि पर बिना पट्टे के काबिज हैं. ऐसे परिवारों पर बेदखली का खतरा मंडराता रहता है. ऐसे परिवार इस कानून की धारा 3(1) के तहत हकदार हो सकते हैं. साथ ही अपने गुजर बसर के लिए वन भूमि पर लकड़ी, पत्ती, घास,जड़ी बूटी, खड्ड, नाले, रेत बजरी आदि के लिए कानून की धारा 3(1) के तहत ग्राम सभा को सामूहिक वन अधिकार के लिए दावा पेश कर सकते हैं.

“हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य का दो तिहाई भौगोलिकक्षेत्र कानूनी रूप से ‘वन भूमि में दर्ज है और यहां अधिकतर जनता खेती और पशुपालन पर टिकी है इसलिए वन अधिकार कानून की धारा 3(1) यहाँ बिलकुल लागू होती है. इन सभी प्रावधानों के बावजूद हिमाचल में केवल धारा 3(२) को लागू किया गया जिसमें विकास कार्यों के लिए वन भूमि का हस्तान्त्र्ण होता है. इसके फलस्वरुप आज पूरे राज्य में लोग इस कानून को निर्माण कार्यों के लिए वन भूमि देने का कानून मान बैठे हैं” हिमाचल वन अधिकार मंच से जुड़े हिमधरा समूह के कार्यकर्ता प्रकाश भंडारी ने कहा.

सेव लाहौल स्पीती संस्था के अध्यक्ष प्रेम कटोच ने अपने व्यक्तव्य में कहा की हालाकि लाहौल में वन अधिकार कानून के तहत व्यक्तिगत और सामूहिक दावे पेश हुए हैं और 74 दावे मंज़ूर भी हुए हैं, अभी भी प्रशासन का रवैया बहुत उदासीन है. इसी बात को जन जातीय क्षेत्र किन्नौर के आर सी नेगी ने भी दोहराया जिनके औनुसार किन्नौर में 2000 से अधिक दावों की फाईलें पेश हो चुकी हैं परन्तु प्रशासन द्वारा उलटी सीढ़ी आपातियाँ लगा कर इन पर कार्यवाही आगे नहीं बढाई जा रही. लाहौल स्पीती तथा किन्नौर के पूरे जन जातीय क्षेत्र से यह साफ़ उभर के आया है कि आने वाले चुनावों में वन अधिकार का मुद्दा जनता के लिए अहम रहेगा.

गुज्जर घुमंतू पशुपालकों के प्रतिनिधि लाल हुसैन ने बताया की जंगलों पर आधारित उनके समुदाय के लाखों लोगों के लिए यह कानून बहुत महत्वपूर्ण है क्यों की इस कानून में सामूहिक अधिकारों में पशुचराई का अधिकार भी शामिल है.

आज की जन सभा में हिमाचल वन अधिकार मंच ने दिविशनल कमिशनर को ज्ञापन सौंपा और एक जन घोषणा पत्र जारी किया जिसमें इस कानून के सही क्रियान्वयन के लिए निम्न मांगे सभी पार्टियों के सामने रही हैं:

    सभी सम्बंधित बिभागों (line departments) के अधिकारीयों, पंचायत सचिव, पटवारी, गार्ड तथा वन अधिकार समिति के सदस्यों के लिए वन अधिकार कानून परतत्काल प्रशिक्षण

  जिला कांगड़ा, लाहौलस्पीति, किन्नौर और चंबा की डीएलसी और एसडीएलसी में लंबित व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज करना

  जानकारी और प्रशिक्षण के आभाव मेकाँगड़ा, चम्बा और मंडी की ग्राम सभाओं सेगलत तरीके से लिए ‘निल क्लेम’ (शुन्य दावा) प्रपत्रों को निरस्त करना

 सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वन भूमि से किसी भी प्रकार की बेदखली पर तुरंत रोक
लगाकर वन अधिकार कानून लागू करना

हिमाचल वन अधिकार मंच हिमाचल प्रदेश के अलग अलग क्षेत्र के संगठन और सामुदायिक संस्थाओं का मंच है जो वन अधिकार कानून 2006 को हिमाचल में प्रभावी तौर से लागू करवाने के लिए कार्यरत है|

हिमाचल वन अधिकार मंच निम्न संगठनों है व संस्थाओं का एक साझा मंच है:

-ऑल-इंडिया गुज्जर महासभा, चम्बा
– किसान सभा, बैजनाथ
– घुमन्तु पशुपालक महासभा, काँगड़ा
– जिला वन अधिकार समिति,किन्नौर
– पर्यावरण ग्राम विकास संगठन,मंडी
– पर्वतीय महिला अधिकार मंच, काँगड़ा
– सामाजिक आर्थिक समानता के लिए जन अभियान, काँगड़ा
– सिरमौर वन अधिकार समिति, सिरमौर
– सेव लाहौल-स्पीति सोसाइटी, लाहौल
– स्पीति सिविल सोसाइटी, स्पीति
– हिमालय बचाओ समिति, चम्बा
– हिमधरा पर्यावरण समूह
– और प्रदेश की सक्रिय वन अधिकार समितियां

Press Note: 11th April 2019: Demand for FRA implementation echoes in Mandi Lok Sabha Constituency

As the nation goes to poll for its 17th Lok Sabha elections, Himachal’s geographically largest constituency Mandi comprising of Kinnaur, Bharmour, Lahaul Spiti, Kullu, Mandi districts is echoing with the demand for implementation of the Forest Rights Act (FRA) 2006. A public gathering of close to 600 people held a rally on the issues of rights on forest land today at Mandi district headquarters.

“Individual and community forest rights recognised under the Forest Rights Act 2006 are crucial for majority of the population in Himachal and despite this the government and administration have failed to remove the hurdles in the implementation of the Act in the State”. In order to further amplify the demand for FRA, the Himachal Van Adhikar Manch, a platform of community organisations and activists, called for the public meeting and protest at Mandi on the 11th April 2019. The Forest Rights Act was passed by the Parliament of India in 2006, with the aim of protecting the interests as well as providing legal recognition and recording the rights of the communities dependent on forest land for their bonafide livelihoods. Lakhs of people all across the country have benefited during past 10 years under this act but in the state of Himachal Pradesh merely 129 claims have been recorded till now.

“Even within Himachal Pradesh, while atleast claims have been filed in Kinnaur, Lahaul and Kangra, the case of Mandi District is extremely unfortunate where since 2014 blanket ‘zero claims’ certificates have been procured by the administration from forest right committees of all villages indicating that people have no claims to make under this act”, added Akshay Jasrotia, Convenor of Himachal Van Adhikar Manch. This step was intiated by the then District Magistrate on the basis of templates issued by Prinicipal Secretary forests in June 2014. “We had been demanding for the withdrawal of these templates on the grounds that they were in contravention of the Act”, added Jasrotia.

Shyam Singh Chauhan, an associate of the Manch, who is a member of the District Level Committee (Mandi) formed under the Act and also the Zilla Parishad Member from Karsog Mandi added, “We sent a submission for the immediate withdrawal of the ‘Nil Certificates’ to the State Level Monitoring Committee in January and infact the SLMC headed by the Chief Secretary had taken up the matter seriously”. The minutes of the SLMC meeting of 15th January 2019 state that these templates (formats) were “creating confusion” and that the revenue and forest department should issue direction to field officials for recognitions & vesting of rights under the Act.

Section 3(1) of FRA allow recognition of rights over forest land for agriculture and habitation for ‘bonafide livelihood’ needs (not just for subsistence purposes but also for earning an income). It also includes 13 types of community rights from forest land including grazing, fodder, fuelwood, medicinal plants, cultural and spiritual uses etc. provides Community Forest Resource Rights under which the rights to protect, manage and conserve forest resources are recognized. “These are very crucial in a state like Himachal Pradesh where more than 70% of the geographical area in under the category of forest land and people practice agriculture and livestock rearing”, according to Prakash Bhandari, a member of Himdhara Collective, also part of the Manch. “Its unfortunate that the Himachal government has used this act only for the purposes of forest diversion while ignoring and scuttling section 3(1) of the Act”, he added.

Section 3(2) of the Act which includes rights of the Gram Sabha to provide consent to diversion of less than 1 hectare of forest land (involving felling of not more than 75 trees) for 13 types of village development activities has been implemented in the State and close to 1900 cases have been approved so far. “Where as the Ministry of Tribal Affairs, the nodal agency for implementation of FRA had already clarified that implementation of Section 3(1) and 3(2) have to be done parallelly, but this has not happened”.

Prem Katoch, President of the Save Lahaul-Spiti society said that while claims had been filed from Lahaul and rights have been given in 76 cases, the administration was extremely lax and arbitrary in its approach. R.C Negi from Him Lok Jagriti Manch, Kinnaur specifically raised the issue of the administration misinterpreting the law and stalling claim files by raising false objections. Both representatives of the tribal belt said that they would vote for the party that would prioritise the fair implementation of FRA in the State.

Representative of the Gujjar Community of nomadic livestock rearers Laal Hussain from Chamba emphasized the need for the community rights over grazing lands and alpine pastures under this act. He said that this election they would support only those who speak of rights and not of other non-issues.

The Himachal Van Adhikar Manch endorsed a submission signed by more than hundreds of FRC members made to the Divisional Commissioner demanding withdrawal of the Mandi zero claims certificates. The Manch also released a people’s demand charter with the key demands of: immediate withdrawal of the ‘Zero Claims’ certificates taken in Mandi, Chamba and Kangra Districts; Reopening of the claim filing process in these regions; Immediate review and action on the pending files; and most importantly a detailed and thorough training and awareness program for all officials of the concerned line departments as well as for the Forest Rights Committees of the entire state. Without widespread information and understanding of the law, it is impossible for people to make a demand for its implementation.

It is estimated that FRA is likely to be an issue of the electorate in more that 25% of the constituencies in the country. And there is no doubt that in Himachal too, this issue is gaining momentum among the people.

Media coverage:

Dainik Jagran

Amar Ujala

The Tribune

Business Standard

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