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प्रेस विज्ञप्ति: वन अधिकार कानून के अंतर्गत जल्द से जल्द मिलें अधिकार: वन अधिकार मंच, 2 मई 2018

2 मई 2018
शिमला

हिमाचल वन अधिकार मंच के सदस्यों ने शिमला में 1 मई को रणनीति बैठक का आयोजन किया और 2 मई को राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से मिल कर वन अधिकार कानून 2006 से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की और ज्ञापन भी सौंपा। मंच की बैठक में चंबा, सिरमौर, काँगड़ा, किन्नौर और लाहौल स्पीती जिलों से प्रतिनिधि शामिल थे। “नयी सरकार को इस कानून के धरातल पर क्रियान्वयन में आ रही अड़चनों और चुनौतियों से अवगत कराना ज़रूरी था। आज इस कानून को लागू हुए 10 साल हो गए हैं और हिमाचल में आज भी सरकारी अधिकारियों को इस कानून की पूरी जानकारी तक नहीं – जिसकी वजह से यह कानून हिमाचल में ढंग से लागू नहीं हुआ है”, मंच के सदस्यों ने आज एक प्रेस वार्ता में बताया।

गौरतलब है की 2008 में जब यह कानून पूरे देश में लागु हुआ तो हिमाचल प्रदेश सरकार ने केवल जनजातीय जिलों में इसको लागू किया। 2012 में उच्च न्यायालय के आदेश के बाद इसको पूरे राज्य में लागू किया गया। हिमाचल जैसे राज्य में जहां 70% से अधिक भूगोल, वन भूमि की श्रेणी में है और 90% से अधिक जनता मूलभूत सुविधाओं और आजीविका के लिए वनों और वन भूमि पर आश्रित हैं – वहां इस क़ानून को जल्द से जल्द लागू होना चाहिए था। हालाकि पिछले 3 सालों में राज्य में 17,534  वन अधिकार समितियों का गठन भी हो चुका है – परन्तु इस कानून के अंतर्गत निजी और सामुदायिक अधिकारों को पूर्ण मान्यता नहीं मिली – जहां पूरे भारत में लाखों हेक्टेयर वन भूमि पर अधिकार दिए जा चुके हैं वहां हिमाचल में मात्र 7 गाँवों को सामूहिक अधिकार मिले हैं। “राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी इसका मुख्य कारण हैं, दूसरी बड़ी समस्या है कि ऊपर से ले कर नीचे तक सरकारी तंत्र में कानून के बारे में आधी-अधूरी जानकारी है। जनता में भी इस कानून को लेकर जागरूकता नहीं है”, मंच के समन्वयक अक्षय जसरोटिया ने बताया।

मंच ने सरकार को दिए ज्ञापन में यह आग्रह किया है कि इस कानून को तुरंत लागू करने के लिए कांगड़ा, किन्नौर, चंबा, लाहौल स्पीती से किये गए निजी और सामूहिक अधिकारों के दावों पर निर्णय लिया जाए। साथ ही सरकारी अधिकारियों और वन अधिकार समिति, ज़िला स्तरीय समिति और उप मंडल स्तरीय समिति के प्रतिनिधियों के लिए कानूनी प्रशिक्षण किये जाए ताकि कानून से जुडी भ्रांतियों पर स्पष्टता आ पाये. बड़ी परियोजनाओं के लिए वनों के हस्तांतरण के मामलों में यह स्पष्ट होना चाहिए कि जब तक वन अधिकार कानून की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो जाती तब तक कोई भी हस्तांतरण गैर कानूनी है। घुमंतू पशुपालकों के अधिकारों को मान्यता देने के लिए यह आवश्यक है की ज़िला स्तरीय समिति पहल कर ग्राम सभाओं से सम्बंधित प्रक्रिया चलाये। मंच ने राज्य में गैर-कानूनी अतिक्रमक बता कर सभी वन भूमि पर आश्रित समुदायों के कब्ज़े हटाने की प्रक्रिया पर प्रश्न उठाया और यह कहा की वन अधिकार कानून के अंतर्गत पहले प्रक्रिया को लागू करना आवश्यक है ताकि जिनकी आजीविका वन भूमि पर टिकी हुई है उनके साथ अन्याय न हो.

वन अधिकार कानून की खासियत यह है कि यह वन आश्रित समुदायों को वनों के संरक्षण और संवर्धन की ज़िम्मेदारी भी सौंपता है। तो यह मान्यता कि इस कानून के लागू होने से वनों का नुकसान होगा – यह गलत है। बल्कि यदि वनों का संरक्षण होना है तो सरकार को वनों के साथ रहने वाले समुदायों को स्थायी अधिकार देने होंगे – ताकि उनके हक-हकूक बरकरार रह सकें और लम्बे समय तक उनके पास आजीविका के साधन उपलब्ध रहे। हिमाचल वन अधिकार मंच का गठन 2016 में हुआ और तब से यह मंच वन अधिकार से जुड़े मुद्दे राज्य में उठा रहा है।साथ ही साथ मंच के सदस्य ज़िला स्तरीय प्रशिक्षण और लोक जागरूकता का अभियान भी चला रहे हैं जिसके चलते कम से कम कुछ क्षेत्रों में दावे भरने का कार्य आगे बढ़ पाया है।

Copy of memorandum

Press Coverage
Dainik Jagarn

The Statesman

The Tribune

Press Note: Expedite Forest Rights Act Implementation: Van Adhikar Manch

2nd May 2018
Shimla

The Himachal Van Adhikar Manch a platform of forest rights activists and community representatives from the State today met senior government officials to submit a memorandum apprising them of the problems and challenges leading to a delay in implementation of the Forest Rights Act in the State. The delegation which had its strategy meeting on 1st May 2018 here in Shimla comprised of represenatatives from Kinnaur, lahaul Spiti, Chamba, Sirmaur and Kangra. “The new government must be put in the know of the pathetic situation vis a vis implementation of FRA 2006 in Himachal. In a state where 70% of the geographical area is under forest land and 90% of the population are dependent on this land for their livelihoods in one way or another, this act needed to be urgently implemented. However, 10 years after passing of the legislation, things are at a standstill”, said members of the Manch.

Citing lack of political will as the key reason for the delay in implementation of the Act the Manch in its memorandum has urged the new Chief Minister Jai Ram Thakur to expedite the process of claims verification and issuing of titles under the Act. The key provision and objective of this Act is to recognise the claims, both individual and common, of local communities on the forest lands that they depend on for their livelihoods. This Act was historical because it provided the much-needed relief to those who had years of “occupations” on forest land for their day to day livelihood. It also provided an opportunity to recognise communities’ rights and responsibility towards conservation and protection of forests.

In the initial phase the government of Himachal had implemented the Act only in the Schedule – V (Tribal regions) areas of the State. As a result of this there was a serious delay in the process of implementation in the State. In 2013 the government after a High Court order and repeated instructions from the Centre decided to implement the Act in non-tribal areas also. Despite the formation of more than 17503 Forest Right Committees (FRCs), which would file the claims, the process is not taking off in most areas. “Local administration and government officials have partial understanding of the act and several misgivings as a result of which the process is just not moving forward. Unless there are clear instructions from the State Government as well as thorough trainings there will not be any progress”.

“It is extremely unfortunate that after forming FRCs in 99.82% of revenue villages only 53 individuals and 7 community titles have been issued under the Act in Himachal, while in the rest of the country around 17.31 lakhs individual titles and 62.92 thousands community titles have been issued over more than 137.50 lakhs acres of forest land”, the memorandum stated.

It is clear that the State government cannot carry out any forest diversion for large development projects until and unless the process of recognition of rights is complete under the Forest Rights Act 2006. However, instead of implementing the act the previous government had in 2014 issued formats for getting Gram Sabhas NOCs relinquishing their rights under the Forest Rights Act. This needs to be withdrawn and all such ‘false’ NOCs take from Gram Sabhas without them having a complete understanding of the Act need to be declared null and void.

The Manch strongly challenged the eviction drive by the State government on the grounds that the FRA 2006 has recognized and vested forests rights mentioned in Section 3 (1) of the Act. So, after 1st December 2008 the year this Act got implemented, the “encroachments” on forest land should be dealt with as “occupations” on forest land. As FRA, 2006 overrides all other legislations, it means the occupations on forest land cannot be treated as illegal encroachments under the “Himachal Pradesh Public Premises and Land (Eviction and Rent Recovery) Act 1971”, till the recognition and verification process mentioned under Section 6 of the Act is complete. Moreover, according to section 4 (5) of the Act the occupation on forest land cannot be evicted or removed till process of confirmation/verification of rights under the Act is not complete. It is the responsibility of the government to ensure that the rightholders are not unduly evicted.

The HVAM, formed in 2016 has been over the last 2 years organizing regional dialogues and trainings in order to facilitate the speedy implementation of the act as a result of which community and individual claims have been filed in Kangra, Lahaul-Spiti, Chamba, Sirmaur and other districts.

Copy of memorandum

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Dainik Jagarn

The Statesman

The Tribune

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