वन अधिकार कानून 2006: जनता की मांगों के साथ 22 जुलाई को जिला-स्तरीय कार्यक्रम का आव्हान!

वन अधिकार कानून देश में लागू हुए एक दशक से ज्यादा हो गया पर आज भी इस कानून को सरकारें ढंग से लागू नहीं कर रहीं हैं. एक तरफ हिमाचल जैसे राज्य हैं जहां इसका क्रियान्वयन बहुत धीमी गति से चल रहा है तो कई ऐसे राज्य हैं जहां लाखों दावे भरे गए हैं परन्तु इनमें से कई गैर कानूनी तरीके से खारिज कर दिए गए. राज्य सरकारों के उदासीन रवैये के साथ साथ न्यायालयों की भूमिका भी इस कानून को ले कर निराशाजनक रही है. वन भूमि पर अपनी वास्तविक व्यक्तिगत और सामूहिक ज़रूरतों के लिए निर्भर लोगों को अधिकार देने के लिए बनाया गया यह कानून पारित होने से पहले ही विरोध का शिकार रहा. विरोधी पक्ष में वन विभाग ख़ास कर कुछ सेवानिवृत वन अधिकारियों और वन्यजीव संरक्षण के लिए काम कर रहे कुछ एन.जी.ओ शामिल थे जिन्होंने मिल कर कानून के नियम पारित होते ही 2008 में इसके संवैधानिक वैधता को ही न्यायालय में चुनौती दे दी (CWP109/2008). इस कोशिश में असफल होने के बाद याचिकाकर्ताओं ने याचिका के मूल बिन्दु से हट कर ‘बोगस दावों’ पर बात करना शुरू कर दिया.

फरवरी में सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

लगभग 6 महीने पहले 13 फरवरी 2019 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में यह आदेश जारी किया था कि वन अधिकार कानून के तहत जिन दावेदारों के दावे खारिज किये जा चुके हैं उनको अगली सुनवाई से पहले बेदखल किया जाय. यह निर्देश 16 राज्यों को दिए गए थे जिनमें कम से कम 20 लाख दावेदार परिवार प्रभावित होते (तक़रीबन 60 लाख लोग) जो की इस कानून के तहत आदिवासी या अन्य-परंपरागत वन-निवासी की श्रेणी में हैं. कोर्ट का यह निर्णय कमज़ोर तथ्यों पर आधारित था और अन्यायपूर्ण भी. ताज्जुब की बात थी कि केंद्र सरकार के जनजातीय मंत्रालय से कोई भी वकील कानून की पैरवी करने के लिए कई पेशियों में मौजूद नहीं थे. देश भर में संगठनों द्वारा कड़े विरोध और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के FRA के पक्ष में एफेडेविट के बाद जन जातीय मंत्रालय ने अपना पक्ष रखते हुए कोर्ट को बताया कि खारिज दावों का सीधा अर्थ यह नहीं है कि दावेदार का कब्ज़ा नाजायज़ है. 28 फरवरी को न्यायालय ने अपने आदेश पर रोक लगा दी और सभी राज्यों से दावों के खारिज होने की प्रक्रिया पर विस्तृत जवाब माँगा. इस केस की अगली सुनवाई इस महीने यानी जुलाई की 24 को होगी.

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और हिमाचल का सन्दर्भ

गौर तलब है कि वन विभाग की दखल अंदाजी या फिर प्रशासन को कानून के प्रावधानों की पूरी जानकारी न होने की वजह से अधिकतर राज्यों में दावेदारों के दावे गलत प्रमाणों पर खारिज किये गए हैं. जैसे कि हिमाचल में हुआ – जहां किन्नौर की लिप्पा ग्राम सभा के 47 दावेदारों के दावे डी.एल.सी के 3 सरकारी सदस्यों ने 3 अन्य जिला परिषद् सदस्य जो की इस समिती के भी सदस्य हैं, उनकी बात को दरकिनार करते हुए गलत और मनगढ़ंत आधारों पर खारिज कर दिए थे. जबकि समिति ने इसी लिप्पा गांव के सामुदायिक अधिकारों को बिना किसी आपत्ति के स्वीककृति दी जिसमें उन्हें ‘प्राथमिक रुप से वनों में रहने वाले, वन निवासी’ माना गया है. जबकि व्यक्तिगत दावों को खारिज करने का यह कारण दिया गया कि दावेदार ‘प्राथमिक रुप से वनों में रहने वाले, वन निवासी’ नहीं हैं. मामले पर दावेदारों ने राज्य स्तरीय निगरानी समिति, SLMC को भी अपील भेजी थी पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुयी और अब राज्य सरकार इन निरस्त दावों को सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट करने जा रही है.

हिमाचल में प्रशासन ख़ास कर वन विभाग ने लगातार यह भूमिका ली है कि अंग्रेजों के समय किये वन बंदोबस्ती के दौरान सभी वन अधिकारों को मान्यता मिल चुकी है और अब इस कानून की हिमाचल को ज़रुरत नहीं. इस गलत धारणा को चुनौती देते हुए चंबा और लाहौल की ज़िला स्तरीय समितियों ने कुल 136 दावे को मान्यता दी है. जब की हिमाचल में FRA के अनतर्गत दस वर्षों में केवल लगभग 2500 दावे आये हैं क्यों कि सरकार आज तक जनता को इस कानून पर भरोसा नहीं दिला पाई जिस तरह से 2002 में भूमि नियमतिकरण नीति बनाते समय दिलाया था जिसके चलते करीब 1.60 लाख लोगों ने अपने वन भूमि पर कब्ज़ों पर अधिकार लेने के लिए मिसलें (फॉर्म) भरीं थीं. उस समय केंद्र में कानूनी प्रावधान नहीं होने की वजह से 2002 की नीति कामयाब नहीं हो पाई परन्तु आज वन अधिकार कानून के अनतर्गत सरकार के पास मौक़ा है कि पात्र दावेदारों को न्याय दिला सके.

FRA की धारा 3(2) के तहत विकास कार्यों पर सुप्रीम कोर्ट का दखल

हिमाचल में जहां कानून की धारा 3(1) में दिए व्यक्तिगत (खेती, रिहाइश) और सामूहिक अधिकारों को ले कर सरकार आगे कदम बढ़ाने से कतरा रही है वहीँ दूसरी तरफ इसी कानून की धारा 3(2) के अंतर्गत पात्र दावेदारों के लिए, सरकारी यूज़र एजेंसी के 13 प्रकार के विकास कार्यों के अधिकार को तेज़ी से लागू किया जा रहा है. इसके चलते 1700 से भी अधिक स्थानीय विकास परियोजनाओं से लोगों को फायदा मिला है. परन्तु 11 मार्च 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने 1996 के गोदावार्मन केस (CWP 202/1995) की एक याचिका (IA 3480/2014) में हिमाचल राज्य में FRA की धारा 3(2) के अंतर्गत वन भूमि के इस्तेमाल पर रोक लगाई. जबकि कोर्ट का मामला वन संरक्षण कानून 1980 के तहत बड़ी परियोजनाओं से वनों के दोहन को रोकने को ले कर शुरू हुआ और हिमाचल में वन विभाग द्वारा पेड़ों की छंगाई (सिल्विकल्चर) के लिए ग्रीन फेल्लिंग के बैन को हटाने बारे था. हिमाचल के सेवानिवृत वन प्रमुख वी.पी.मोहन की अध्यक्षता में कोर्ट द्वारा गठित कमिटी की रिपोर्ट की सिफारिश के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने यह अंतरिम आदेश दिया और डी.एफ्फ़.ओ को मंज़ूरी देने पर रोक लगायी थी. न्यायालय ने इसमें ढील देते हुए 3 मई की सुनवाई में 38 हेक्टेयर भूमि पर 89 परियोजनाओं के लिए स्वीकृति प्रदान की और FRA के तहत भविष्य की कार्य योजना मांगी थी. परन्तु अब हिमाचल में 11 मार्च के अंतरिम फैसले की गलत व्याख्या करते हुए वन विभाग के अधिकारियों द्वारा यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि सुप्रीमे कोर्ट ने वन अधिकार कानून पर ही रोक लगा दी है और अब डी.एफ.ओ नई परियोजनाएं मंज़ूर नहीं कर सकते. यह सरासर गलत है.

हिमाचल में वन अधिकार कानून के लिए जनता का संघर्ष

साथियों हिमाचल में हम सब साझे तौर पर वन अधिकार कानून के लिए संघर्षरत रहें हैं जिसके चलते राज्य सरकार आज इस कानून को लागू करने के लिए कुछ कदम उठा रही है. परन्तु इस समय देश में वन अधिकार कानून की स्थिति नाज़ुक है और सर्वोच्च न्यायालय में 24 जुलाई की सुनवाई से पहले जनता की आवाज़ और मांगें प्रशासन और मीडिया के माध्यम से आगे पहुंचाना बहुत महत्वपूर्ण है. 22 जुलाई को देश भर के सामाजिक संगठन और वन अधिकार कानून की मांग कर रहे समुदाय अपने अपने क्षेत्रों में जन अभियान/ धरना/ प्रेस वार्ता/ रैली/ जन सभा आदि कर रहें हैं और हमें भी इस अभियान में साथ देना है. अपनी मुहीम को प्रभावी बनाने के लिए हम 22 जुलाई को अपने अपने जिलों में वन अधिकार कानून को ले कर बैठक/कार्यक्रम कर जिला प्रशासन को ज्ञापन देने का आव्हान दे रहें हैं. हमारी आवाज़ वन भूमि पर आश्रित लोगों की बेदखली के खिलाफ़ और वन अधिकार कानून को लागू करने के पक्ष में बुलंद हो!

हमारी प्रमुख मांगे:

  • लिप्पा गाँव के दावों पर राज्य स्तर पर पुनःविचार हो – जबतक अपील की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती इनको सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट न किया जाय
  • जिला कांगड़ा, लाहौलस्पीति, किन्नौर और चंबा की डी.एल.सी और एसडी.एल.सी में लंबित व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज की जाय
  • वन अधिकार कानून से जुड़ी गलत फ़हमियों को दूर करने के लिए अधिकारियों का प्रशिक्षण किये जाय
  • वन भूमि से किसी भी प्रकार की बेदखली पर तुरंत रोक लगाकर वन अधिकार कानून प्रभावी रुप से लागू किया जाय
  • कानून की उपयुक्तता को मानते हुए सभी अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया को पूरा किया जाय
  • धारा 3(2) से जुड़ी गलत फ़हमियों को दूर करने के लिए सरकार की तरफ से सभी विभागों को स्पष्टीकरंण पत्र जारी किया जाय

शिक्षित हों!     संगठित हों!     संघर्ष करो!

हिमाचल वन अधिकार मंच

Memorandum to Chief Minister of Himachal Pradesh

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